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रावण के 10 सिर ही कियु 11 क्यों नहीं Ramayan (Ramayan hi kiyu or koi kiu naam nahi)P11

Part 11

Ramayan (Ramayan hi kiyu or koi kiu naam nahi) 

 दोस्तों मेरा नाम कांतिलाल सुथार आज देखते है 

रावण के 10 सिर ही कियु 11 क्यों नहीं 

रावण के दस सिर होने की चर्चा रामायण में आती है। वह कृष्णपक्ष की अमावस्या को युद्ध के लिये चला था तथा एक-एक दिन क्रमशः एक-एक सिर कटते हैं। इस तरह दसवें दिन अर्थात् शुक्लपक्ष की दशमी को रावण का वध होता है। रामचरितमानस में यह भी वर्णन आता है कि जिस सिर को राम अपने बाण से काट देते हैं पुनः उसके स्थान पर दूसरा सिर उभर आता था। विचार करने की बात है कि क्या एक अंग के कट जाने पर वहाँ पुनः नया अंग उत्पन्न हो सकता है? वस्तुतः रावण के ये सिर कृत्रिम थे - आसुरी माया से बने हुये। मारीच का चाँदी के बिन्दुओं से युक्त स्वर्ण मृग बन जाना, रावण का सीता के समक्ष राम का कटा हुआ सिर रखना आदि से सिद्ध होता है कि राक्षस मायावी थे। वे अनेक प्रकार के इन्द्रजाल (जादू) जानते थे। तो रावण के दस सिर और बीस हाथों को भी कृत्रिम माना जा सकता है। लेकिन कुछ विद्वान मानते हैं कि रावण के दस सिरों की बात प्रतीकात्मक है- उसमें दस मनुष्यों की जितनी बुद्धि थी और दस आदमियों का बल था!


आदिवासी मान्यता के अनुसार वह लोग रावण को अपना पूर्वज मानते हैं और उनके कई तथ्य भी सही है क्योंकि पूरे देश में जहां सारे धर्म के लोग यहां तक कि ब्राह्मण और तमिल दशहरे के दिन रावण दहन करते हैं वही पूरे हिंदुस्तान के आदिवासी ज्यादातर गोंड उस दिन को अपने वीर राजा रावण मंडावी की मृत्यु का शोक मनाते है वह पूजा गोंगो करते हैं| आदिवासी के इसमें दशानन मतलब राजा कहा गया है और आदिवासियों के पूर्वज वाह महापुरुष भी राजा रावण को अपना पूर्वज मानते हैं और उन्हें आदिवासी समुदाय की गोंड जनजाति के सदस्य मानते हैं और उनको सात गोत्र धारी मानते हैं और उन्हें राजा रावण मंडावी कहते हैंआगे वे लिखते हैं "रावण को देखते ही राम मुग्ध हो जाते हैं और कहते हैं कि रूप, सौन्दर्य, धैर्य, कान्ति तथा सर्वलक्षणयुक्त होने पर भी यदि इस रावण में अधर्म बलवान न होता तो यह देवलोक का भी स्वामी बन जाता।

पीतल के रथ पर रावण, सियरसोल राजबाड़ी, पश्चिम बंगाल, भारत

रावण मे कितना ही राक्षसत्व क्यों न हो, उसके गुणों विस्मृत नहीं किया जा सकता। ऐसा माना जाता हैं कि रावण शंकर भगवान का बड़ा भक्त था। वह महा तेजस्वी, प्रतापी, पराक्रमी, रूपवान तथा विद्वान था।

वाल्मीकि उसके गुणों को निष्पक्षता के साथ स्वीकार करते हुये उसे चारों वेदों का विश्वविख्यात ज्ञाता और महान विद्वान बताते हैं। वे अपने रामायण में हनुमान का रावण के दरबार में प्रवेश के समय लिखते हैं

रावण दुष्ट था और पापी था | शास्त्रों के अनुसार वह किसी भी स्त्री को स्पर्श नहीं कर सकता बगैर उसकी इच्छा के, अगर वह ऐसा करेगा तो वह जल कर भस्म हो जाएगा | इसी कारण वह सीताजी को छू तक नहीं पाया |

वाल्मीकि रामायण और रामचरितमानस दोनों ही ग्रंथों में रावण को बहुत महत्त्व दिया गया है। राक्षसी माता और ऋषि पिता की सन्तान होने के कारण सदैव दो परस्पर विरोधी तत्त्व रावण के अन्तःकरण को मथते रहते हैं।


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